महाराष्ट्र की यह डॉक्टर दंपति कर रही है लोगों का मुफ्त में इलाज…

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महंगे इलाज के चलते जहां आज देश में लाखों लोग अपनी जान गवा रहे हैं. वहीँ भारत में ऐसे कई गाँव है जहां पर स्वंत्रता के बाद से आज तक चिकित्सा की सुविधा नहीं है. ऐसे दुर्लभ गाँवों के लोगों को मुख्य धारा में जोड़ने और अच्छी चिकित्सा सेवा देने के संकल्प को लेकर एक डॉक्टर दंपति इस अच्छे काम में लग गई है. वे रोज कोसों दूर जाकर उन लोगों का मुफ्त में इलाज कर रहे हैं जो इस सुविधा से अब तक वंचित थे. उनके इस सेवाभाव को देखते हुए सरकार सहित कई सामाजिक सेवा समितियों ने भी उन्हें सम्मानित किया है, उस सम्मान से उनको जो भी धनराशि मिली है उसे भी उन्होंने इस अच्छे काम में लगा दिया है. आइए जानते हैं वो डॉक्टर दंपति हैं कौन और किस प्रकार से वह इस अच्छे काम में लगे हैं.

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लाखों रूपए खर्च करके डॉक्टर बने लोगों की दिली-तमन्ना रहती है कमाने की. लेकिन महाराष्ट्र की एक डॉक्टर दंपति स्मिता और रवींद्र कोल्हे हैं, जो 32 साल से इस पेशे में हैं और वे अपने पेशे का उपयोग लोगों को मुफ्त इलाज देने में करते हैं. उन्होंने अपनी पढ़ाई के आखरी दिनों में संकल्प लिया था कि मैं अपने इस पेशे का उपयोग मानवसेवा में करुगा.

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इसके लिए उन्होंने कसम खाई थी कि वे समाज के उस आखरी शख्स तक पहुचेंगे, जिसको इलाज की बहुत आवश्कता है. उन्होंने बताया कि, इसके लिए मैं पढ़ाई के बाद तीन साल तक देश में घूमता रहा. आखिर में जाकर मुझे को वह गाँव मिल ही गया जिसकी मुझे तलाश थी. जहां पर सुविधा के नाम पर कुछ नहीं है, आज भी यहाँ के लोग मुख्य धारा से कोसो दूर हैं. उन लोगो को मैं अपनी डॉक्टरी सेवा देकर मुख्य धारा से जोड़ने का अच्छा काम कर रहा हूँ इसके लिए में उनका मुफ्त में इलाज कर रहा हूँ.”

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ये ऐसा गाँव है जहाँ पर पहुचने के लिए कोई साधन नहीं है, जिला मुख्यालय से 30 किलो मीटर तक तो वाहन सुविधा है इसके बाद आपको इस गाँव में पहुचने के लिए 20 किलो मीटर की यात्रा पैदल करनी पड़ती है तब जाकर गाँव आता है. वे अब इस गाँव में सम्मान की राशि से सर्वसुविधा युक्त हास्पिटल बना रहे हैं, इसके लिए वह खेती भी कर रहे हैं. उनका मानना है कि जब लोगों खाने को अच्छा मिलेगा तो वह बीमार नहीं पड़ेगे. इसके लिए खुद भी खेती कर रहे और गाँव के लोगों को भी आर्गनिक खेती करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. साथ ही इससे जो कमाई होगी उसको हास्पिटल बनाने में लगाएंगे.

Published by Tarun Rathore on 14 Nov 2017

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