देश के अलग-अलग हिस्सों में देखे जाते हैं होली के कई रंग

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होली एक भारतीय हर्षोल्लास का त्यौहार है और यह बसंत ऋतु में मनाया जाता है. इस पर्व को बसंत पंचमी के दिन गुलाल उड़ाकर शुरू किया जाता है लेकिन होली के दिन इसे देशभर में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है. सभी जगह इस त्यौहार को मनाने का अंदाज भी अलग होता है. रंग पंचमी इस त्यौहार का आखिरी दिन होता है और उसे भी बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है.

लठमार होली –

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आपको लठमार होली के बारे में तो सुना ही होगा. इसे लठमार होली इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस त्यौहार में महिलाएं युवकों पर लाठियां बरसाती हैं. दरअसल यह एक प्राचीन परंपरा है. जिसका पालन करते हुए आज भी यह त्यौहार इसी तरह मनाया जाता है. परंपरा के अनुसार नंदगांव से युवकों की टोलि बरसाने आती है और वहां की महिलाओं उन्हें रंग लगाती हैं और लठ मारती है.

फगुआ  –

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यह बिहार का त्यौहार है और इसमें वहां लोग बसंत पंचमी के बाद से ही होली के लोकगीत गाने शुरू कर देते हैं. इन गानों को फाग भी कहा जाता है और आंध्रप्रदेश में इसे ‘फगुआ’ नाम से जाना जाता है. इस परंपरा के अनुसार सुबह धूल, कीचड़ से होली खेली जाती है और दोपहर को नहाकर रंग खेला जाता है. इसके बाद शाम को गुलाल से होली खेली जाती है और हर घर के दरवाजे पर घूमते हुए फगुआ गीत गया जाता है.

गीत बैठकी –

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गीत बैठकी का आयोजन उत्तराखंड के नैनीताल और अल्मोड़ा जिले में किया जाता है. ये बैठकी होली से पहले ही जमने लगती है और बैठकों में राग-रागिनियों के साथ मीरा बाई और मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर की कई कहानियां और रचनाएं सुनने को मिलती है.

भगौरिया –

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यह मध्यप्रदेश के कुछ ही इलाके में मनाया जाता है. इसे धार, झाबुआ, खरगोन आदि क्षेत्र में मनाया जाता है. इसमें आदिवासी लोग इस पर्व में अपनी जीवनसाथी का चुनाव करते है और हाट-बाजार और मेले में होली मनाया जाता है.

रंगपंचमी –

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यह मुख्यतः महाराष्ट्र में मनाया जाता है. यह होली के पांच दिन बाद मनाया जाता है. इसमें सूखे गुलाल से उत्सव मनाया जाता है. राजस्थान में इस दिन को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. जैसलमेर में मंदिर महल में लोकनृत्यों का आयोजन किया जाता है और रंग उड़ाया जाता है. विदेशी भी इस आयोजन में भाग लेते हैं. मध्यप्रदेश में भी रंगपंचमी को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. मालवा में बैंड बाजे के साथ इस दिन जुलूस निकाले जाते हैं.

शिमगो –

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यह गोवा में मनाया जाता है और बसंत पंचमी से रंगों का खेल शुरू हो जाता है.

याओसांग –

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यह पर्व मणिपुर में मनाया जाता है. इस पर्व को याओसांग बोला जाता है और यह होली से मिलता जुलता होता है और यहां धुलैंडी वाले दिन को पिचकारी कहा जाता है. याओसांग के बारे में बताया जाता है इसका मतलब झोपडी होता है और फागुन पूर्णिमा के दिन नदी सरोवर के तट पर झोपडी भी बनाई जाती है. इस झोपडी में चैतन्य महाप्रभु की प्रतिमा स्थापित किया जाता है और पूजन के वक्त इस झोपडी को जला दिया जाता है. उस राख को लोग अपने मस्तक पर लगाया जाता है.

दोल जात्रा –

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यह बंगाल में होली के एक दिन पहले मनाया जाता है. इस दिन महिलाऐं शंख बजाते हुए राधा-कृष्ण की पूजा करती हैं. झूले पर राधा-कृष्ण की मूर्तियां रखकर पूजा किया जाता है. आपकी जानकारी के लिए बात दें कि दोल का मतलब झुला होता है और इस दिन गुलाल और रंगों से होली खेली जाती है.

Published by Pravesh on 01 Mar 2018

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