ब्रिटेन के मुकाबले भारत में ज्यादा हो रही हैं सिज़ेरियन डिलीवरी, गाइनोकॉलजिस्ट ने बताए कारण

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किसी भी महिला के लिए मां बनना बहुत सौभाग्य के साथ ही बहुत खुशी की बात भी होती है लेकिन इस पढ़ाव तक आने के लिए उसे कई दर्द भी सहने होते हैं. कई परेशानियों का सामना करने के बाद वह बच्चे को जन्म दे पाती है. गर्भधारण से लेकर डिलीवरी तक का समय किसी भी महिला के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है. किसी भी महिला के लिए सबसे कठिन समय वह होता है जब उसे पता चलता है कि उसकी डिलीवरी ऑपरेशन से होगी. वैसे आज के समय में कई महिलाएं ज़्यादातर सिज़ेरियन को तवज्जो देती हैं क्योंकि नार्मल डिलीवरी का दर्द सहना नहीं चाहती.

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हाल ही में सुबर्ना घोष नाम की एक महिला ने ऑनलाइन फोरम Change.Org पर एक याचिका डाली है जिसमें उन्होंने अपील की है कि सभी अस्पताल ये बताएं कि उनके यहां कितने बच्चे सिज़ेरियन तरीके से हुए और कितने नॉर्मल. ऐसा सुबर्ना ने इसलिए किया क्योंकि उनकी भी सिज़ेरियन डिलीवरी हुई थी जिससे उन्हें उबरने में काफी समय लगा था.

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तो चलिए जानते हैं इस विषय पर डॉक्टर्स की राय –

गाइनोकॉलजिस्ट डॉक्टर मधु गोयल का मानना है कि सिज़ेरियन के बाद रिकवरी में वक़्त लगता है जबकि नॉर्मल डिलीवरी के बाद महिला बहुत जल्दी एक्टिव हो जाती है. सिज़ेरियन डिलीवरी के दौरान कई बार बहुत ज़्यादा ख़ून भी निकल जाता है जिससे कमज़ोरी, शरीर में दूध न बनने और डिप्रेशन जैसी दिक्कतें हो सकती हैं. इसके अलावा सिज़ेरियन के बाद औरतों में मोटापा और डायबिटीज़ होने की आशंका भी कई गुना बढ़ जाती है.

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डॉक्टर आगे कहती हैं, “हम जैसे डॉक्टरों पर अक्सर ये आरोप लगता है कि हम अपनी आसानी और पैसों के लिए जानबूझकर सिज़ेरियन डिलीवरी करते हैं, लेकिन ऐसा नहीं हैं. कई बार औरतें ख़ुद वजाइनल डिलीवरी का दर्द झेलने के लिए तैयार नहीं होतीं और हमें उनके कहने पर सिज़ेरियन तरीका चुनना पड़ता है.” इसके अलावा कई बार तो लोग चाहते हैं कि बच्चा किसी ख़ास दिन या ख़ास मुहूर्त में पैदा हो. ऐसी स्थिति में भी हमें सी-सेक्शन का रास्ता ही अपनाना होता है.

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यह है बढ़ रही सिज़ेरियन डिलीवरी की वजह –

इसके कारण के बारे में बताते हुए डॉ. मधु बताती है लड़कियों का ज़्यादा उम्र में और प्रसव से पहले पर्याप्त एक्सरसाइज़ या शारीरिक मेहनत न करना इसका मुख्य कारण हैं. साथ ही उन्होंने कहा, “इन सबके पीछे हमारी बदलती लाइफ़स्टाइल एक बहुत बड़ी वजह है. आज लड़कियां देर से शादी करती हैं और देर से मां बनती हैं. वो ज़रूरी एक्सरसाइज़ भी नहीं करतीं इसी वजह से उनके लिए नॉर्मल डिलीवरी के ज़रिए मां बनना मुश्किल होता है.”

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अब यह तो बात हुई भारत भी लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत से ज्यादा नॉर्मल डिलीवरी ब्रिटेन में हो रही है. जी हां, यह सच है ब्रिटेन के साथ ही कई विकसित देशों में सिज़ेरियन डिलीवरी का प्रतिशत भारत की तुलना में काफी कम है. 2015 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार इंग्लैंड में 11, इटली में 25 और नॉर्वे में सिर्फ 6.6 फीसदी डिलीवरी ही सिज़ेरियन तरीके से होती है. ब्रिटेन के रॉयल कॉलेज ऑफ़ मिडवाइव्स की सलाहकार गेल जॉनसन ने बीबीसी से कहा, “हम सिज़ेरियन को इमरजेंसी में इस्तेमाल करते हैं. ये रास्ता तभी चुना जाता है जब किसी वजह से वजाइनल डिलीवरी नहीं कराई जा सकती. सिज़ेरियन को आख़िरी विकल्प के तौर पर इसलिए भी देखते हैं क्योंकि इसमें ख़तरे ज़्यादा हैं.”

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ब्रिटेन में कुछ साल पहले तक डॉक्टर ही यह फ़ैसला लेते थे कि सिज़ेरियन करना है या नहीं. यानी अगर कोई महिला सिज़ेरियन चाहती भी हो तो डॉक्टर ऐसा करने से इनकार कर सकते थे. हालांकि ये नियम साल 2011 में बदल दिया गया था और नए नियम के मुताबिक अगर महिला सिज़ेरियन डिलीवरी चाहती है तो डॉक्टर को वैसा ही करना होगा. इसके साथ डॉक्टरों से ये उम्मीद की जाती है कि वो महिलाओं को सिज़ेरियन के नुक़सान और ख़तरों के बारे में समझाएं.

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साल 2011 की गाइडलाइंस में कहा गया है कि सिज़ेरियन डिलिवरी चाहने वाली औरतों को मानसिक रूप से नॉर्मल डिलीवरी के लिए तैयार किया जाना चाहिए.

Published by Chanchala Verma on 29 Mar 2018

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