दादा साहेब फाल्के की 149वीं जयंती के मौके पर गूगल ने डूडल बनाकर किया दादा साहेब को याद

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गूगल अपना डूडल हमेशा किसी बड़े अवसर पर बदलता है. इसी तरह आज गूगल ने दादा साहेब फाल्के की 149 वीं जयंती के अवसर पर अपना डूडल उन्हें समर्पित किया है. इस डूडल में दादा साहेब रील लिए दिखाई दे रहे हैं और साथ ही डूडल के आसपास दादा साहेब की कुछ अन्य तस्वीरें भी है. जिनमें वे अलग-अलग रोल में नज़र आ रहे हैं. दादा साहेब फाल्के भारतीय फिल्म जगत के ‘पितामह’ हैं. इनके ही सम्मान में भारतीय सरकार ने 1969 में दादा साहेब फाल्के अवार्ड की शुरुआत की थी. यह अवार्ड भारत का सबसे प्रतिष्ठित अवार्ड है.

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दादा साहेब फाल्के का जन्म 30 अप्रैल 1870 को महाराष्ट्र के एक मराठी परिवार में हुआ था. उनका असली नाम धुंडीराज गोविन्द फाल्के था. दादा साहेब फाल्के को बचपन से ही कला के क्षेत्र में रूचि थी. उन्होंने मात्र 15 साल की उम्र में ही मुंबई के फेमस आर्ट कॉलेज ‘जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट्स’ में दाखिला लिया था. जहां से वो ‘कला भवन ऑफ़ बड़ोदा’ चले गए, वहां उन्होंने फोटोग्राफी और पेंटिंग सीखी. उन्होंने अपना करियर बतौर फोटोग्राफर शुरू किया था.

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दादा साहेब फाल्के का फ़िल्मी जगत में आने का सफर काफी रोमांचक रहा था. दादा साहेब फाल्के ने साल 1910 में एक साइलेंट फिल्म ‘द लाइफ ऑफ़ क्राइस्ट’ देखी और इस फिल्म को देखने के बाद 2 महीनें तक रिलीज़ हुई सारी फिल्में देखी. फिर उन्होंने निर्णय लिया कि वो फिल्म का निर्माण करेंगे और भारतीय फिल्म जगत एक नया इतिहास रचेगा’. उन्होंने फिल्म के निर्माण के लिए अपनी पत्नी से पैसे उधार लिए और फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई जोकि एक साइलेंट फिल्म थी. इस फिल्म की सफलता के बाद उन्होंने कई फ़िल्में बनाई जिनमें ‘सत्यवान सावित्री’, ‘मोहिनी भस्मासुर’ और ‘लंका दहन’ उनकी प्रमुख फिल्मों में से थी. कोल्हापुर के नरेश के आग्रह पर 1938 में दादा साहब ने पहली और आखिरी बोलती फिल्म ‘गंगावतरण’ बनाई.

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ब्रिटिश के राज में साल 1944 में दादा साहेब ने आखिरी फिल्म बनाने की इच्छा जाहिर की थी. उस समय फिल्म बनाने के लिए पहले ब्रिटिशर्स से लाइसेंस लेने की जरूरत पड़ती थी और जब दादा साहेब ने लाइसेंस माँगा तो उन्हें इंकार कर दिया गया था. इस बात का सदमा दादा साहेब को लगा और इसके दो दिन बाद ही दादा साहेब ने दुनिया को अलविदा कह दिया. लेकिन आज भी दादा साहेब फाल्के का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है और इनका नाम भारतीय सिनेमा जगत में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है.

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भारतीय फिल्म जगत में दादा साहेब के जन्मदिन के अवसर पर ‘लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड’ दिया जाता  है. इस अवार्ड की शुरुआत भारतीय सरकार ने दादा साहेब की 25वीं पुण्यतिथि (1969) पर की थी. यह अवार्ड किसी खास व्यक्ति को उसके फिल्म जगत में आजीवन योगदान के लिए दिया जाता है. यह अवार्ड पहली बार 1969 में अभिनेत्री देविका रानी को दिया गया था.

Published by admin on 30 Apr 2018

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