‘दिल बहलाने के लिए ग़ालिब ये ख़्याल बहुत बुरा है’

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आजकल पेट्रोल और डीजल की बढ़ी हुई कीमतों से सारा देश तिलमिलाया हुआ है, और ऐसा होगा भी क्यों नहीं. आखिर ये पैसा हमारी मेहनत की गाढ़ी कमाई से जाता है. खैर चलिए, थोड़ी देर के लिए ये दर्द ‌भूलकर दूसरी ‌बात करते हैं.

तीन महीने से भी ज्यादा हो चुके हैं इस साल का बजट आए हुए, और हर साल यही होता है कि, जब भी ये बजट आता है उसके बाद कुछ दिन तक न्यूज़ चैनलों पर उसी को लेकर बहस चलती रहती है. वैसे ये तो हर बार ही होता है. कुछ विश्लेषण होते हैं, आरोप–प्रत्यारोप, कुछ दिनों तक बातें, और फिर सब वैसा ही, जैसा चलता है, जिसकी हमें आदत भी है.

बहरहाल न्यूज़ वाली बात से ध्यान आया कि, कुछ दिन पहले न्यूज़ चैनल पर एक खबर चल रही थी कि, देश की कुल संपत्ति का 73% हिस्सा सिर्फ इस मुल्क के 1% अमीरों के पास है, और भारत में अमीर बहुत तेज़ी से अमीर बन रहे हैं और गरीब और भी ज्यादा गरीब, और ये 1% अमीर अरबपति बन चुके हैं, तो दूसरे न्यूज़ चैनल पर खबर चल रही थी कि, देश में युवाओं की बेरोजगारी दर बढ़कर 10.7% हो चुकी है, जो पिछले कई वर्षों की अपेक्षा काफी ज्यादा है, और बेरोजगारी की ये खाई अभी और भी ज्यादा गहरी होगी.

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उसी के कुछ महीने पहले एक चैनल देखा तो पता चला पूरे देश में फिल्म ‘पद्मावत’ के विरोध की आग से अरबों की संपत्ति का विनाश हो गया, और वाहनों से लेकर स्कूली बच्चों तक सभी इस आग की चपेट में आ गए थे. वैसे आग से बड़ा गहरा रिश्ता हो गया है हमारे देश का, मसलन अभी कूछ महीने पहले ही मुंबई महानगर से लेकर समूचे देश में जिस तरह से आगजनी की बड़ी–बड़ी घटनाएं हुई और उन हादसों में कई लोग मारे गए, मगर कोई बात नहीं अगर वो आग बुझ भी जाए, तो हम खुद भी तो आग लगाने के लिए तैयार बैठे हैं.

बहरहाल इसी साल के शुरूआती दिनों में महाराष्ट्र भर में दलित आन्दोलन की आग ने बड़ा जोर पकड़ा और दो दिनों के इस आन्दोलन में करीब साढ़े तीन हज़ार करोड़ से भी ज्यादा की संपत्ति का विनाश हो गया. गौर करने वाली बात ये है कि, उसी वक़्त एक खबर आ रही थी कि, आतंकवादियों की पनाहगार बन चुके पाकिस्तान को, अमेरिका ने आड़े हाथ लिया और, उसे दी जाने वाली मदद की एक बड़ी किश्त तकरीबन 1625 करोड़ की आर्थिक सहायता को रोक दिया और उसके बाद पाकिस्तान को दिए जाने वाले रक्षा बजट को भी रोक दिया.

एक तरफ पाकिस्तान 1625 करोड़ रुपये की उस मदद को रोके जाने के बाद बौखला गया और ऐसा लगा कि, उस मुल्क की साँसे ही रुक गईं, और दूसरी तरफ हमारे देश के नौजवान साढ़े तीन हज़ार करोड़ रुपये की आहुति बड़े ही फक्र से आग लगाकर उस आग के हवनकुंड में प्रवाहित कर देते हैं, और उसके बाद उन्हें लगता है कि, वो इस धरती पर सब कुछ जीत चुके हैं, फिर नौजवानों का एक हुजूम एक फिल्म के विरोध में अरबों की संपत्ति को स्वाहा करता है, और पूरे देश का पुलिस प्रसाशन इतने गंभीर मुद्दे और उन्हें रोकने के लिए अपनी ड्यूटी करता है, शायद एक बार तो उन्हें अपने पुलिस फोर्स में होने पर भी शर्म आई होगी कि, अब सिर्फ उनका काम यही बचा है कि, पूरे देश में अलग–अलग मुद्दों पर ये आग भड़कती रहे, और वो बेचारे खुद को भी उस आग में झुलसने से बचाएं, और जो झुलस रहे हैं, उन्हें भी बाहर निकालें.

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खैर ये आग अभी बुझी भी नहीं थी कि, फिर से जाट आन्दोलन की एक और आग हर बार की तरह फिर धधकने लगी, वो जाट जो इस देश में शायद बहुत बड़े पैमाने पर संपन्न हैं, लेकिन उनके लिए आरक्षण तो फिर भी बनता है, वैसे तो उनके पास ठसक है, चौधराहट है, लेकिन आरक्षण के मामले में वो बहुत गरीब हैं, शायद उसके बाद भारत के संपन्न और ज़मींदार गुर्जरों का गुर्जर आन्दोलन शुरू हो जायेगा, उन्हें भी आरक्षण की ये भीख चाहिए, कुछ रेल की पटरियां उखाड़ी जायेंगी, कहीं आग लगाईं जाएगी, और हमेशा की तरह देश की हज़ारों करोड़ की संपत्ति धू–धू करके स्वाहा हो जाएगी, खैर ये तो इस देश के नागरिकों का हक है, दुनियां के इस सबसे बड़े लोकतंत्र का जन्मसिद्ध अधिकार है.

बहरहाल एक के बाद एक चिंगारियां तो इस देश में सुलगती ही रहेगी, और अब तो आग को भी यहाँ बड़ा मज़ा आने लगा है, आखिर उसे इतना स्कोप और कहाँ मिलेगा, उसे भी आदत पड़ गई है कि, कब जल्दी से फिर से उसकी बारी आये, और वो खेल में सबसे आगे निकल जाए. खुश होने वाली बात ये है कि, बेरोजगारी की आग में जल रहे इस देश के युवाओं के लिए पिछले कुछ दिनों में बड़े रोजगार के मौके भी उभरकर आये, और ये रोजगार हज़ारों नहीं बल्कि लाखों और करोड़ों के पैकेज के साथ लुभावने अवसर के रूप में थे, एक बार तो लगा कि, इस तरह के अवसर अगर जल्दी–जल्दी आयें तो करोड़ों की संख्या में इस देश के युवा सीधे करोड़पति बन जायेंगे, और करना भी क्या है, सिर्फ किसी हीरोइन या निर्देशक की नाक या गला काटकर लाना है, या फिर किसी गायक के सिर का मुंडन कर देना है, और करोड़ों रुपये ले जाना है, वाकई कितने दरियादिल हैं इस देश के ये महान लोग, उन्हें तो बारम्बार प्रणाम करने का मन करता है.

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खैर इन सब बातों के बीच अहम् बात ये है कि, शुरुआत से लेकर अब तक जितनी भी घटनाओं का इस लेख में ज़िक्र है, कहीं उनका आपस में कोई ताल्लुकात तो नहीं, और जब गौर किया तो लगा कि, बड़ा ही गहरा सम्बन्ध है सबका एक दूसरे से, मसलन देश के युवाओं का वो बड़ा वर्ग जो इन सब घटनाओं में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेता हैं, वो जो बेरोजगार है, वो जो किसी के हाथों की कठपुतली है, वो जो इनमें से किसी से भी ज्यादा सरोकार नहीं रखता, बस भीड़ में सबसे आगे चलने का माद्दा है उनके पास, वो जो कश्मीर से लेकर महाराष्ट्र तक और यूपी, बिहार से लेकर आँध्रप्रदेश और कर्नाटक तक आगे बढकर सबसे पहले पत्थर फेंकने की हिमाकत करते हैं, और शक्ति प्रदर्शन करते हैं, असल में उन्हें तो पता ही नहीं कि, वो कितने कमज़ोर हैं और ये बल प्रदर्शन तो किसी और का ही हो रहा है, वो जो दिन ब दिन कमज़ोर हो रहे हैं, आर्थिक रूप से, सामजिक रूप से और बढ़ती हुई उम्र से भी, और वो कमज़ोर हो रहे हैं, इसीलिए अमीरी–गरीबी की ये खाई भी बढ़ रही है, अमीर और ज्यादा अमीर हो रहे हैं, और यही अमीर बड़े ही रुतबे के साथ दूर किसी ऊंचे से झरोखे से इन नौजवानों की बेवकूफियों पर ठहाके लगा रहे हैं, और उन्हें इस बात का यकीन भी है कि, ये लोग हमेशा ऐसे ही रहेंगे और, अमीरों के खजाने भी यहाँ भरते रहेंगे, क्योंकि इनके पास तो रोजगार तलाश करने की फुर्सत ही नहीं, और अगर रोजगार है भी तो उससे भी वक़्त निकालकर उन्हें इन आन्दोलनों में हिस्सा लेना है, और अगर आरक्षण वाला आसान तरीका उन्हें मिल रहा है तो फिर योग्यता से भी उन्हें कोई सरोकार नहीं है, लेकिन उन्हें पता नहीं है योग्य तो वो लोग हैं जो इस आग को हवा देकर, इन युवाओं को आगे कर देते हैं और फिर पीछे बैठकर बड़े ठाठ से हुक्का फूंकते हैं.

बहरहाल शक्ति प्रदर्शन तो इस देश का पहला और सबसे प्रमुख धर्म है, फिर चाहे वो प्रदर्शन संसद में हो, सड़कों पर हो, या फिर रेल की पटरियों पर, उसके बाद एक और शक्ति प्रदर्शन और वो है न्यूज़ चैनलों का, अलग–अलग तबके के चार लोगों को ये चैनल वाले पकड़कर बिठाएँगे, फिर उनके बीच भी चैनल के एंकर बातों से थोड़ी सी आग लगायेंगे, फिर झूठ–मूठ ही उसे बुझाने का या उनमें सुलह कराने का प्रयास करते नज़र आयेंगे.

हर चैनल का सिर्फ यही आलम, ऐसा लगता है कि, इन चैनलों और वहां बैठकर बहस करने वाले लोगों ने पूरे देश की हर समस्या को सुलझाने का ठेका ले लिया हो, और उन्हें हर परेशानी की वजह भी पता है, सब अपनी जगह वाजिब हैं, फिर बीच-बीच में लम्बे–लम्बे कमर्शियल ब्रेक, और कहीं नहीं जाने की नसीहत का लिफाफा पकड़ाकर एंकर का बीच में ही गायब हो जाना, क्योंकि अरबों रुपये के विज्ञापनों का खेल भी तो इसी बहस से चलता है, हर चैनल खुद को सबसे आगे बताने और ज्यादा आग भड़काने की होड़ में, वातानुकूलित स्टूडियो में एंकर सूट–बूट और टाई में पूरी तरह तैयार, हर खबर को मसाले के साथ पेश करने के लिए बेकरार, यहाँ भी शक्ति प्रदर्शन, और मोटी–मोटी तनख्वाह पाने वाले इन सभी न्यूज़ चैनल के ठेकेदार भी अपने आपको इस देश की आवाम के विधाता से कम नहीं समझते, अपने–अपने तरीके से समस्याएं गिना रहे हैं, नसीहतें दिए जा रहे हैं, और अपने चैनल की अहमियत भी बता रहे हैं, आखिर उनकी ड्यूटी भी तो यही है.

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अब इस बात का ज़िक्र भी यहाँ ज़रूरी है कि, जिस फिल्म के लिए पिछले दिनों इतना बड़ा हंगामा खड़ा हुआ, क्या उसे रोका नहीं जा सकता था, जब राजस्थान में इस फिल्म की शूटिंग के दौरान एक बड़ी हिंसक वारदात हुई थी, तभी इस देश की सरकार और न्याय व्यवस्था को बात इतनी ज्यादा बढ़ने से पहले रोका जाना चाहिए था, ये आन्दोलनकारी इस फिल्म के बनने का इंतज़ार करते रहे, और अपनी शक्ति प्रदर्शन की वजह ढूंढने के लिए एक अदद मौके की तलाश करते रहे.

सबसे बड़ी बात ये है कि, करोड़ों लोग, जो इन चन्द लोगों की बातों में आकर सबसे आगे चल रहे थे, उनकी अपनी समझदारी या नज़रिया कहाँ था, क्या एक बार भी उनके मन में ये ख़याल नहीं आया कि, जिस फिल्म को किसी ने देखा ही नहीं, उसके लिए इतना बड़ा बवाल, खैर ये बात भी वहीँ ख़तम, लेकिन अब जब पूरी दुनिया में धड़ल्ले से ये फिल्म चली, और अरबों रुपए की कमाई हुई, तो फिर वो सब लोग कहाँ चले गए थे, एक दिन पहले जिस आग से पूरा देश जल रहा था, दूसरे दिन उसके बारे में कहीं से एक आवाज़ तक नहीं आई, कोई सफाई नहीं आई, देश की संपत्ति को हानि पहुँचाने का कोई मलाल नहीं और अपने किये पर कोई पछतावा नहीं, कमाल है, तो क्या ये सब मज़े के लिए किया था, खुद का टाईमपास करना था, और सरकार का करवाना था, अरे कितनी बेचैनी बढ़ गई थी देश के लोगों में, पता नहीं अब क्या होगा, और जाने क्या-क्या होगा, लेकिन अगले सीन में तो स्क्रिप्ट ही ख़तम, फिर वही ढाक के तीन पात, सरकार खामोश, बुद्धिजीवी मायूस और कुछ ख़ास लोग एक नए मुद्दे की तलाश में, आखिर सरकारें तो तभी बनती और बिगड़ती हैं, गिरती है फिर संभलती है, और फिर अपने मन की बात करती है’.

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हर आन्दोलन की आग कुछ दिनों के बाद ठंडी पड़ जाती है, जन जीवन भी सामान्य हो जाता है, जातिगत खाइयां भूलकर सारा समाज फिर से एक साथ काम करने लगता है, फिर कहीं से ख़बर आती है कि, पेट्रोल के दाम आधी रात से बढ़ गए, तेल , पानी, राशन सब कुछ रातों रात महंगा हो गया, फिर हम चिल्लाते हैं, हर साल एक बजट आता है, जो सिर्फ और सिर्फ पिछले वर्ष की अपेक्षा घाटे का ही होता है, आखिर क्यों नहीं होगा, एक तो इस देश के अनगिनत नेताओं की सुख सुविधाओं का भारी भरकम बोझ, और ऊपर से खुद हर साल इस देश की आवाम द्वारा या फिर प्राकृतिक आपदाओं और आतंकवाद या घुसपैठ से निपटने के लिए खर्च होने वाली बेहिसाब दौलत, तो फिर महंगाई तो बढ़ेगी ही, क्योंकि हम भूल जाते हैं, ये वही महंगाई है, जिसका बीज हमने खुद ही बोया था, और अरबों की संपत्ति को सड़क पर खड़े होकर ख़ाक में मिला दिया था, अब ये वसूल भी तो हमसे ही की जाएगी, आखिर सरकारें कब–कब इस देश में नुकसान की भरपाई करती रही हैं ? और अगर ऐसा होता तो सारे नेता सबसे ज्यादा गरीब होते, न्यूज़ चैनल का एंकर हफ्ते भर एक ही ड्रेस पहनता, फिल्म निर्माता के पास अगली फिल्म बनाने के लिए पैसे नहीं बचते, और तो और हमें तो ये भी याद नहीं रहता कि, आखिर हमने ऐसा किया क्या था, जिसका खामियाजा हमें बाद में चुकाना पड़ता है, बिलकुल उसी कहावत की तरह, ‘जंगल में मोर नाचा, किसने देखा, किसने देखा..’

पर जिसको देखना था उसने तो देख लिया, अपना उल्लू भी सीधा कर लिया, और आग बुझाने के बाद नयी चिंगारी लेकर आगे भी चल दिया, क्योंकि मशाल तो उसे हम ही बनायेंगे, और वो सिर्फ तमाशा देखेंगे, आखिर मुद्दे नहीं होंगे तो सियासत कैसे होगी, सियासत नहीं होगी तो वर्चस्व कैसे होगा, विपक्ष कैसे होगा, और जनता से वसूली गई कमाई का खजाना अगले चुनाव पर खर्च कैसे होगा, न्यूज़ चैनल कैसे चलेंगे, सियासी गलियारों में खरीद–फरोख्त कैसे होगी, और फिर वही नेता सबसे ऊंचे पायेदान पर खड़े होकर हर आग के साक्षी बनेंगे, मूक रहेंगे, और ठीक उनके नीचे खड़े हुए लोग, जिन्हें वो ऊपर वाले कभी नहीं देख पाते, उनके सामने हम सब चिल्लाते रहेंगे कि, ये आग कब बुझेगी. और ये देश चिल्लाकर हमसे बार–बार यही कहेगा कि सिर्फ तुम लोगों की वजह से आज भी बीमार हूँ मैं, …. ‘बहुत बीमार हूँ मैं..’

हर नुकसान की भरपाई हमें ही करना है, हर हादसे का सबसे बुरा असर हम पर ही होता है, उनके निशान हमे सालों साल तक रुलाते रहते हैं, और खुद की लगाईं हुई आग को बुझाने में हमारे हाथ इतने झुलस जाते हैं, कि, हमे फिर उनकी जलन का एहसास तक नहीं होता, हम अमीरों को और अमीर बनाते जाते हैं, और खुद के लिए और अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए एक ऐसी खाई बना देते हैं, जहाँ सिर्फ भूखमरी, गरीबी, मंहगाई, तंगहाली और बेबसी में नेताओं के झूठे वादे सुनने के सिवा हमारे पास कुछ नहीं बचता, फिर हमारे पास खुश रहने का एक ही बहाना बचता है कि, बुलेट ट्रेन आएगी, और वो बहुत सारा राशन, पैसे, और खुशियों को हमारे लिए भरकर, अपने साथ लाएगी, हो सकता है हमारे जीते जी कभी इस तरह के बजट वाली ट्रेन आ जाए, ऐसा हम सोच सकते हैं, लेकिन दिल बहलाने के लिए ग़ालिब ये ख्याल बहुत बुरा है.

Written by: विशुद्ध आनन्द शर्मा (आकाश)

Published by Hitesh Songara on 28 May 2018

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