‘दो जून की रोटी’ का जून महीने से नहीं है दूर-दूर तक कोई वास्ता

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‘दो जून की रोटी’ को वैसे तो हमने एक मुहावरे के रूप में कई बार सुना है, लेकिन क्या आप इसका सही मतलब जानते हैं? शायद नहीं! तो चलिए आज हम आपको बताते हैं कि आखिर ‘दो जून की रोटी’ का अर्थ क्या है. दरअसल इस मुहावरे का संबंध जून महीने से बिलकुल भी नहीं है. वैसे इस बारे में अब तक यह भी नहीं पता चला है कि इस मुहावरे की शुरुआत कहाँ से हुई है लेकिन इसका शाब्दिक अर्थ जरुर सामने है.

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चलिए समझते हैं विस्तार से :

इस मुहावरे ‘दो जून की रोटी’ के बारे में विक्रम विश्व विद्यालय के कुलानुशासक शैलेंद्र कुमार शर्मा का कहना है कि यह भाषा का रूढ़ प्रयोग है. यदि माना जाए तो यह मुहावरा तक़रीबन 600 सालों पहले से प्रचलन में है. वैसे मुहावरों को लेकर यह कहा जाता है कि किसी घटनाक्रम की विशेषता को बताने के लिए मुहावरों का उपयोग किया जाता है. इस मुहावरे को भी आमतौर पर हम कुछ ऐसे ही सुनते हैं कि, ‘दो जून की रोटी नसीबवालों को ही मिलती है.’

इस मामले में अंतरराष्ट्रीय हास्य कवि दिनेश दिग्गज से भी मजाकिया लहजे में पूछा गया कि, इसे आखिर जून की रोटी ही क्यों कहते हैं? हम इसे मार्च या अप्रैल की रोटी क्यों नहीं कहते हैं?

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तब उन्होंने इस बात का जवाब देते हुए कहा, ‘इसे इसलिए मार्च या अप्रैल की रोटी नहीं कहा जाता क्योंकि इसका संबंध किसी भी महीने से नहीं है. इसका मतलब दो समय के खाने यानि सुबह और शाम से होता है. दूसरे शब्दों में इसका मतलब कड़ी मेहनत के बाद लोगों को मिली दो समय की रोटी से होता है.

अवधि भाषा में क्या है ‘दो जून की रोटी’ का मतलब :

इस बारे में संस्कृत विद्वान शास्त्री कौशलेंद्रदास का कहना है कि, दो जून अवधि भाषा का एक शब्द है और इस शब्द का मतलब वक्त या समय से होता है. इसलिए इस शब्द का उपयोग मुहावरे ‘दो जून की रोटी’ में किया गया है.

Published by Hitesh Songara on 02 Jun 2018

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