अपने दफ्तर से नेहरु की फोटो गायब देख नाराज हुए थे वाजपेयी, तुरंत कहा था लगाने के लिए

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देश के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी के जितने चाहने वाले आज हैं उतने ही चाहने वाले उनके राजनीति के शुरूआती दिनों में भी थे. जितना सम्मान वह दूसरे साथी नेताओं का करते थे उतना ही सम्मान उनका भी होता था. उन्होंने राजनीति के प्रारम्भिक दिनों में ही अपनी प्रतिभा की ऐसी छाप छोड़ी थी कि उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु खुद उनके कायल हो गए थे. नेहरु-गांधी परिवार के प्रधानमंत्रियों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी का नाम भारत के इतिहास में उन चुनिंदा नेताओँ में शामिल होगा जिन्होंने सिर्फ़ अपने नाम, व्यक्तित्व और करिश्मे के बूते पर सरकार बनाई थी. उनका और नेहरु का ऐसा ही एक किस्सा सामने आया है.

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पत्रकार किन्गशुक नाग ने अपनी किताब में लिखा है एक बार नेहरु ने ब्रिटिश पीएम से वाजपेयी को मिलवाते हुए कहा था, ‘इनसे मिलिए. यह विपक्ष के उभरते नेता है.’ इसी तरह एक अन्य विदेशी मेहमान से भी नेहरु ने अटल बिहारी वाजपेयी का परिचय एक भावी प्रधानमंत्री के तौर पर कराया था. नेहरु ने अटल बिहारी वाजपेयी को हराने के लिए उनके खिलाफ तत्कालीन दौर के एक्टर बलराज साहनी से प्रचार करवाया था. यह उत्तर की राजनीति में पहला मौका था जब किसी फ़िल्मी स्टार को चुनाव प्रचार में उतारा गया और ये चुनाव अटल बिहारी वाजपेयी हार गए थे.

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लेकिन 1977 में विदेश मंत्री बनने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी जब अपने पहली दफ्तर आए थे. तब उन्होंने देखा कि उनके दफ्तर में नेहरु की कहीं तस्वीर नहीं थी इस बात को लेकर वह काफी नाराज हुए और तुरंत उनकी तस्वीर लगाने को कहा था.

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बता दें एक सामान्य स्कूल टीचर के घर में पैदा हुए वाजपेयी के लिए शुरुआती सफ़र बिलकुल भी आसान नहीं था. 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर के एक निम्न मध्यमवर्ग परिवार में जन्मे वाजपेयी की प्रारंभिक शिक्षा ग्वालियर के ही विक्टोरिया (अब लक्ष्मीबाई) कॉलेज और कानपुर के डीएवी कॉलेज में हुई. उन्होंने राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता में अपना करियर शुरु किया. उन्होंने ‘राष्ट्र धर्म’, ‘पांचजन्य’ और ‘वीर-अर्जुन’ का संपादन किया था.

Published by Yash Sharma on 17 Aug 2018

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