कुशल राजनीतिज्ञ के साथ सरल स्वभाव और विनम्रता के भी धनी थे ‘अटल बिहारी वाजपेयी’

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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी देश के उन चुनिंदा राजनेताओं में से एक रहे जिन्होंने बेदाग़ रहकर अपने राजनीति काल को पूरा किया. अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने व्यक्तित्व और करिश्मे के दम पर अपनी सरकार बनाई थी. अटल बिहारी वाजपेयी का कद इतना बड़ा है कि विश्व के बहुत कम ही नेताओं को इतना नसीब होता है. चाहे वह सरकार में पक्ष में रहें या विपक्ष में लेकिन उन्होंने अपने फैसलों से देश को हमेशा गर्व महसूस करवाया है.

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अटल बिहारी वाजपयी ने 1980 में में भारतीय जनता पार्टी की नींव रखी थी. 1984 में हुए चुनाव में पार्टी को सिर्फ 2 सीट मिली थी. इस वजह से उनसे उनकी पार्टी का अध्यक्ष पद भी छीन लिया गया और वह पद लालकृष्ण आडवाणी को दिया गया. इससे अटल बिहारी वाजपेयी हताश जरुर हुए पर उन्होंने इससे हार नहीं मानी बल्कि उन्होंने अपनी पार्टी को और सहयोग किया और शीर्ष पर ले जाने का काम किया. इस दौरान विपक्ष की पार्टियों ने उन्हें प्रधानमंत्री बनने का प्रलोभन दिया परन्तु उन्होंने इसे ठुकरा दिया.

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अटल बिहारी वाजपेयी ने हमेशा इंसानियत का धर्म निभाया था. वह काफी मिलनसार व्यक्ति थे. उनका ऐसा ही एक किस्सा सुनने को मिलता है जब उनके मित्र मुन्ना उनसे मिलने दिल्ली पहुंचे और उनके पास पत्र पहुंचाया. इस पत्र में उन्होंने लिखा कि, ‘दादा, प्रणाम, तुम्हारा मुन्ना.’ जैसे ही उनके पास यह पर्ची पहुंची वह भागकर उनके मित्र के पास मिलने पहुंच गए. यह किस्सा उनके सरल स्वभाव और सादगी का परिचय देता है. वह बहुत विनम्र और सभी को साथ लेकर चलने वाले व्यक्ति थे.

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अटल बिहारी वाजपेयी कभी हार नहीं मानने वालों में से थे. चाहे जितनी ही विषम परिस्थिति हो उन्होने हमेशा से उसका डटकर सामना किया था. साल 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने थे परन्तु उनके पक्ष में सांसदों की संख्या कम होने की वजह से उनकी सरकार मात्र 13 दिन में गिरा दी गई. दोबारा 1999 में सरकार बनाई गई तब भी मात्र 13 महीने में वापस उनकी सरकार गिरा दी गई. इतनी विफलताओं के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और वापस उन्होंने अपनी सरकार बनाकर अपने पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया.

Published by Yash Sharma on 17 Aug 2018

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