‘मन का जो मीत गया, एक बरस बीत गया’, पढ़िए ‘भारत रत्न’ अटल बिहारी वाजपेयी की कुछ बेहतरीन कविताएं

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भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न से सम्मानित अटल बिहारी वाजपेयी राजनीति में कुशल होने के साथ ही सबके लोकप्रिय नेता भी रहे. वे अलौकिक प्रतिभा के धनी थे. वह एक कुशल राजनेता थे, एक अच्छे वक्ता, एक अछे इंसान के साथ साथ वह एक बहुत ही शानदार कवि और लेखक भी थे. उनकी कविताएं और किताबें हमेशा से प्रेरणा का स्त्रोत रहे हैं. उन्होंने अनेक कविताओं की रचना की थी. उनकी कविताओं से उन्होंने दुनिया को देखने का अपना नजरिया बताया था.

हम आपको उनकी पांच सबसे बेहतरीन कविताएं बता रहे हैं जो सुनने और पढने में बेहद शानदार हैं.

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1. गीत नहीं गाता हूँ

बेनकाब चेहरे हैं दाग बड़े गहरे है,
टूटता तिलस्म आज सच से भय खाता हूं,
गीत नहीं गाता हूं.

लगी कुछ ऐसी नज़र,
बिखरा शीशे सा शहर,
अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं.
गीत नहीं गाता हूं.

पीठ में छुरी सा चांद,
राहु गया रेख फांद,
मुक्ति के क्षणों में बार-बार बंध जाता हूं.
गीत नहीं गाता हूं.

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2. क्या खोया, क्या पाया जग में

क्या खोया, क्या पाया जग में,
मिलते और बिछड़ते मग में,
मुझे किसी से नहीं शिकायत,
यद्यपि छला गया पग-पग में,
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें.

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी,
जीवन एक अनन्त कहानी
पर तन की अपनी सीमाएं,
यद्यपि सौ शरदों की वाणी,
इतना काफी है अंतिम दस्तक पर खुद दरवाजा खोलें.

जन्म-मरण का अविरत फेरा,
जीवन बंजारों का डेरा,
आज यहां, कल कहां कूच है,
कौन जानता, किधर सवेरा,
अंधियारा आकाश असीमित, प्राणों के पंखों को तौलें.
अपने ही मन से कुछ बोलें.

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3. एक बरस बीत गया

एक बरस बीत गया,
झुलासाता जेठ मास.
शरद चांदनी उदास.
सिसकी भरते सावन का.
अंतर्घट रीत गया.
एक बरस बीत गया.

सीकचों मे सिमटा जग.
किंतु विकल प्राण विहग.
धरती से अम्बर तक.
गूंज मुक्ति गीत गया.
एक बरस बीत गया.

पथ निहारते नयन,
गिनते दिन पल छिन,
लौट कभी आएगा,
मन का जो मीत गया,
एक बरस बीत गया.

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4. जीवन बीत चला

कल कल करते आज,
हाथ से निकले सारे,
भूत भविष्यत की चिंता में,
वर्तमान की बाजी हारे.

पहरा कोई काम न आया,
रसघट रीत चला,
जीवन बीत चला.

हानि लाभ के पलड़ों में,
तुलता जीवन व्यापार हो गया,
मोल लगा बिकने वाले का,
बिना बिका बेकार हो गया.

मुझे हाट में छोड़ अकेला,
एक एक कर मीत चला,
जीवन बीत चला.

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5. सच्चाई यह है कि

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं, ,मजबूरी है.

टिप्पणियां ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है.
जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है.

ये कविताएं उनकी कुछ चुनिन्दा कविताओं में से हैं जिन्हे वो अक्सर गुनगुनाया करते थे. वह एक बेहतरीन व्यक्तित्व के धनी थे, साथ ही बहुत विनम्र और शांत स्वभाव वाले व्यक्ति थे. उनकी कुशलता और राजनीति परख के सभी कायल थे.

Published by Yash Sharma on 18 Aug 2018

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