नवरात्रारंभ : माता के नौ रूपों के होंगे दर्शन, हर रूप का अलग है अर्थ और पूजन फल

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आज से नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है और इसके साथ ही देशभर में माता की मूर्ति स्थापना का सिलसिला भी शुरू हो चुका है. नवरात्रि के बारे में बता दें कि नवरात्र एक संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है “नौ रातें”. नवरात्र के दौरान माता के नौ शक्ति रूपों की पूजा की जाती है. सनातन धर्म को मान्यता देने वाले लोगों के लिए यह नौ रातें किसी पर्व से कम नहीं होती हैं. इस दौरान रातों में गरबा, जागरण, डंडिया आदि का भी आयोजन किया जाता है जिसे लोग बहुत एन्जॉय भी करते हैं. इन नौ दिनों में माता के जिन रूपों की पूजा की जाती है चलिए उनके बारे में विस्तार से बताते हैं.

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माता का पहला रूप : इस दौरान पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है. माता का वाहन वृषभ है, और इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल का फूल है. शैलपुत्री माता को स्नेह, करुणा और ममता का प्रतीक माना जाता है.

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माता का दूसरा रूप : दूसरे दिन के अनुसार इनका दूसरा रूप मां ब्रह्मचारिणी के रूप में पूजा जाता है. माता के हाथों में कमल का फूल है, रुद्राक्ष की माला है और कमंडल है. माता का पूजन तप, त्याग, सदाचार और दीर्घायु के लिए किया जाता है.

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माता का तीसरा रूप : तीसरे दिन के दौरान मां दुर्गा के चन्द्रघन्टा स्वरूप की पूजा की जाती है. माता शेर पर सवार होती हैं और युद्ध में दुष्टों का संहार करती हैं. माता के दस हाथ हैं और सभी अस्त्र-शस्त्र से सुशोभित हैं. सांसारिक कष्टों से मुक्ति के लिए माता के इस स्वरूप की पूजा की जाती है.

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माता का चौथा रूप : चौथे दिन माता दुर्गा के कुष्माण्डा स्वरूप की पूजा की जाती है. माता का यह रूप अष्टभुजाधारी है और माता सूर्य लोक में निवास करती है. माता के हाथों में अस्त्र-शस्त्र के साथ ही कलश भी है. माता के इस रूप की पूजा सुख और समृद्धि के लिए होती है.

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माता का पांचवा रूप : नवरात्र के पांचवे दिन माता के स्कन्दमाता रूप की पूजा की जाती है. भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय को ही स्कन्द कहा जाता है और उनकी माता के रूप में स्कन्दमाता को पूजा जाता है. माता सिंह पर स्वर होती हैं और उनके एक साथ में कार्तिकेय विराजमान हैं. माता की पूजा विद्या और बुद्धि के लिए की जाती है.

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माता का छठा रूप : छठे दिन माता के कात्यायनी रूप की पूजा की जाती है. माता की चार भुजा हैं और वे भी सिंह पर सवार होकर आती हैं. माता के एक हाथ में तलवार, दूसरे में कमल का फूल और अन्य हाथों में वर और अभय मुद्रा हैं. शादी, शिक्षा आदि के लिए माता का यह रूप पूजा जाता है.

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माता का सातवा रूप : इस दिन माता के कालरात्रि रूप की पूजा की जाती है. कालरात्रि माता को शुभंकरी भी कहा जाता है क्योंकि माता शुभफल दायिनी हैं. चारभुजा धारी माता की पूजा तंत्र साधना में मुख्य रूप से होती है.

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माता का आठवा रूप : इस दिन माता के रूप महागौरी की पूजा की जाती है. कहा जाता है कि भगवान शिव की प्राप्ति के लिए जब माता ने कठोर तपस्या की तो उनका शरीर क्षीण और काला हो गया था, लेकिन जब प्रसन्न शिव ने उनपर गंगा जल छिड़का तो यह रूप श्वेत कान्ति युक्त हो गया. इसलिए उन्हें महागारी भी कहा जाता है.

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माता का नवां रूप : नवरात्र के इस दिन यानि नवमी के दिन माता के सिद्धिदात्री रूप की पूजा की जाती है. इन्हें सभी सिद्धियों को पूर्ण करने वाली माता कहा जाता है. माता कमल पर विराजित हैं और माता के चारो भुजाओं में कमल के फुल, शंख, चक्र और गदा शोभित हैं.

Published by Hitesh Songara on 10 Oct 2018

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