दिवाली पर पटाखे जलाने के पीछे हैं कई अनोखी बातें, कहीं पर है रिवाज तो कहीं इतिहास है वजह

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भारत में इन दिनों दिवाली सेलिब्रेशन को लेकर काफी तैयारियां चल रही हैं. इस मौके पर सभी लोग मिल-जुलकर इस त्यौहार को सेलिब्रेट करते हैं. इतना ही नहीं इस त्यौहार के लिए लोग हजारों-लाखों रुपए के पटाखे भी लाते हैं और उन्हें जलाते भी हैं. भारत में यह परम्परा काफी समय से चली आ रही है. ऐसी ही परम्परा चीन में भी है जहां नववर्ष पर पटाखे जलाने का रिवाज़ है.

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चीन के लोगों का मत है कि पटाखों से बुरी वस्तुएं दूर भागती हैं और उनके उजालों से रंग-बिरंगी रौशनी का विस्तार होता है. चीन में लोग यह मानते हैं कि आग अनिष्ट को भगा देती है. और इसका शोर भूत प्रेतों को डरा सकता है. नए साल पर वहां के लोगों में बुरी आत्माओं या भूतों को शोर से भगाने की परंपरा है. इसके लिए पटाखों का इस्तेमाल होता है.

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भारत में पटाखों का इतिहास इसी के बाद का बताया जाता है. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि बंगाली बौध तीर्थंकर ने यहाँ पर पटाखे चलाने का रिवाज़ बनाया. कुछ इतिहासकार बताते हैं कि भारत में आतिश दीपांकर नाम के बंगाली बौद्ध धर्मगुरू ने 12वीं सदी में इसे प्रचलित किया. बताया जाता है कि शायद वह चीन, तिब्बत और पूर्व एशिया से पटाखे चलाना सीखकर आए होंगे.

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भारत में तमिलनाडु का शिवकाशी गांव भारत में पटाखा बनाने का सबसे बड़ा केंद्र है. बताया गया है कि यहां के पी. अय्या नादर और उनके भाई शनमुगा नादर ने पटाखा बनाना शुरू किया था. दोनों काम की तलाश में 1923 में कोलकाता गए. वहां एक माचिस फैक्ट्री में काम शुरू किया. वापस लौटकर सबसे पहले दोनों ने शिवकाशी में माचिस फैक्ट्री की शुरुआत की. उसके बाद से धीरे-धीरे दोनों ने पटाखों की फेक्ट्री स्थापित की थी.

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अंग्रेजों ने अपने समय में एक्स्प्लोसिव एक्ट पारित किया था. इसमें पटाखों के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल को बेचने और पटाखे बनाने पर पाबंदी लगा दी गई. 1940 में फिर से इस एक्ट में संशोधन किया गया. एक खास स्तर के पटाखों को बनाना लीगल किया गया तो नादर ब्रदर्स ने पहली पटाखों की फैक्ट्री लगाई. अब शिवकाशी भारत में पटाखा निर्माताओं का गढ़ है. शिवकाशी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आतिशबाजी निर्माण का गढ़ है.

Published by Yash Sharma on 03 Nov 2018

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