14 वीं शताब्दी में शुरू हुई थी कुंभ में शाही स्नान की प्रथा, अंग्रेजों ने बनाया था स्नान का क्रम

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दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन कुम्भ मेला उत्तरप्रदेश के प्रयागराज में शुरू हो चुका है. जहां करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और स्नान का लाभ उठाते हैं. मेले में भारी भीड़ को देखते हुए कई बार स्नान के लिए काफी समस्या का सामना करना पड़ता था. कुंभ मेले में शाही स्‍नान का इतिहास अखाड़ों के आपसी हिंसक संघर्ष वाला रहा है. पहले कौन नहाएगा इसके लिए हमेशा से संघर्ष होते रहे हैं. इसलिए अंग्रेज सरकार ने इसे रोकने के लिए एक क्रम तय किया था जो आज तक चला आ रहा है.

वर्ष 1930 में एक ब्रिटिश ऑफिसर हैंक ने अलग-अलग अखाड़ों के लिए स्‍नान का क्रम तय करने का प्रस्‍ताव रखा. आदेश के अनुसार जो अखाड़े संन्‍यासी मत का अनुसरण करते हैं वह जुलूस का नेतृत्‍व करेंगे मतलब आगे चलेंगे. इनमें महानिर्वाणी अखाड़ा, उसके बाद आनंद अखाड़ा, पंचायती अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा और जूना अखाड़ा आते हैं. इसके बाद अगली पंक्ति में बैरागी अखाड़ा आते हैं. जिनमें निर्मोही अनी, दिगंबर अनी और निर्वाणी अनी हैं.

साथ ही इनके बाद उदासीन मत के नया उदासीन, बड़ा उदासीन और निर्मल अंत में स्‍नान करते हैं. जुलूस का क्रम और स्‍नान का समय अखाड़ों के आकार और संगम से उनके कैंप की दूरी पर निर्भर करता है. हर अखाड़े को अपने स्‍नान के लिए तब तक इंतजार करना पड़ता है जब तक कि उससे पहले गया अखाड़ा स्‍नान करके अपने कैंप में ना लौट जाए. इसी तरह के क्रम को आज भी अपनाया जाता है.

माना जाता है की शाही स्नान की शुरुआत 14 से 16 शताब्दी के बीच हुई थी. इसके बाद से ही कुम्भ में स्नान करने वालो की भीड़ काफी रही है. हर मेले में संख्या बढती ही रही है. बात करें साल 1882 के आंकड़ो की तो इस वर्ष करीब 10 लाख लोग कुम्भ में पहुंचे थे. 1882के कुम्भ में अंग्रेजी सरकार ने विभिन्न रास्तों पर बेरियर लगा कर और सभी रास्तों से कुम्भ में आने वालों की गिनती का आंकड़ा प्रस्तुत किया था.

वहीं वर्तमान की बात करें तो इस वर्ष भी पहले शाही स्नान में करीब 2 करोड़ लोगों ने डूबकी लगाई थी. जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है.

Published by Yash Sharma on 30 Jan 2019

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