अपनी वीरता के लिए इतिहास के पन्नों में आज भी जिंदा हैं झांसी की रानी लक्ष्मीबाई

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बचपन से ही हम झांसी की रानी लक्ष्मीबाई बाई की जीवन गाथा पढ़ते आ रहे हैं और आज ही के दिन यानि 18 जून को लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुई थीं. 19 नवम्बर 1828 को जन्मी लक्ष्मीबाई बचपन से ही चंचल, बुद्धिमान और सुन्दर थीं. उन्होंने बचपन से ही शास्त्रों की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी.

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साल 1842 में लक्ष्मीबाई यानि मनु का विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव नेवालकर के साथ हुआ. जिसके बाद वह झांसी की रानी बन गईं. विवाह के बाद ही उनका नाम मनु से लक्ष्मीबाई हो गया.  साल 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन 4 महीने की उम्र में उसका निधन भी हो गया. पति की तबियत ख़राब रहने की वजह से रानी ने दामोदर राव को अपना दत्तक पुत्र बनाया. जिसके बाद गंगाधर राव की मृत्यु हो गई. ऐसे समय में अंग्रेज झांसी को हड़पने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे. उस समय अंग्रेजी शासकों की यह नीति थी कि यदि किसी राज्य का कोई वारिस नहीं है तो वो राज्य अंग्रेजों के अधीन हो जाएगा. लेकिन दामोदर रानी के दत्तक पुत्र थे जिस वजह से अंग्रेजी शासक झांसी के राज्य को भी नीति से बाहर मान रहे थे. अपनी झांसी को बचाने के लिए रानी को काफी जदोजहत करनी पड़ी लेकिन बात नहीं बन पाई.

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इसी बीच झांसी को 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रमुख केन्द्र बना दिया गया. जहां हिंसा भड़कते देख रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करने की शुरुआत कर दी. जिसके लिए रानी ने एक स्वयंसेवक सेना का गठन किया. जिसमें महिलाओं की भर्ती करवाकर उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया. इस संग्राम में आम जनता भी रानी के साथ आई. इस संग्राम में लक्ष्मीबाई की तरह नजर आने वाली उनकी सहेली और सेविका झलकारी बाई को सेना में मुख्य स्थान दिया गया.

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इसी साल सितम्बर तथा अक्टूबर के महीने में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झांसी पर आक्रमण कर दिया लेकिन रानी ने इसे विफल कर दिया. लेकिन 1858 में अंग्रेजी शासकों ने मार्च के महीने में झांसी शहर को घेर लिया. 2 हफ्ते चली इस लड़ाई के बाद उन्होंने झांसी पर कब्ज़ा कर लिया लेकिन रानी बेटे दामोदर को लेकर वहां से भाग निकलीं. जिसके बाद वह कालपी पहुंचकर तात्या टोपे से मिलीं.

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जिसके बाद तात्या टोपे और रानी की सेना ने मिलकर संयुक्त सेनाओं के साथ ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक क़िले पर क़ब्ज़ा कर लिया. इसमें बाजीराव प्रथम के वंशज अली बहादुर द्वितीय ने भी रानी लक्ष्मीबाई की मदद की थी. बता दें रानी ने एक समय उन्हें राखी भेजी थी जिसकी वजह से अली बहादुर ने रानी की मदद की.

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18 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में हुए युद्ध में अंग्रेजों से लड़ते हुए रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु हो गई. लेकिन रानी अपना नाम इतिहास के पन्नों में जरूर दर्ज करवा चुकी हैं.

Published by Chanchala Verma on 18 Jun 2019

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